नन्दलाल बोस | Nandlal Bose mahan logo ki kahaniya in hindi| Hindi Kahaniya

मनजीत बावा (२८ जुलाई १९४० – २९ दिसंबर २००८) का जन्म भारत में, पंजाब के एक गांव ढुरी में हुआ। दिल्ली के कालेज आफ आर्ट्स और लंदन स्कूल आफ प्रिंटिंग से शिक्षा प्राप्त बावा पहले ऐसे कलाकार थे, जिन्होंने पाश्चात्य कला में बहुलता रखने वाले धूसर और भूरे रंग के वर्चस्व को तोड़कर चटक भारतीय रंगों ( बैंगनी और लाल) को प्रमुखता दी। बांसुरी और गायों के प्रति बावा का आकर्षण बचपन से ही था, जो आजीवन साथ रहा। देशज रंगों और रूपाकारों के कुशल चितेरे बावा की कृतियों में ये आकर्षण विद्यमान है। लाल रंग उन्हें बेहद प्रिय था। वे नीले आकाश को भी लाल रंग से उकेरना चाहते थे। विलक्षण रंग प्रयोग की विशेषता के बावजूद सीमित रंगों का प्रयोग और व्यापक रंगानुभव, सूफीयना तबीयत के कलाकार बावा के कला संसार की पहचान है। कला समीक्षक उमा नायर के अनुसार बावा, कला में नव आंदोलन का हिस्सा थे। रंगों की उनकी समझ अद्भुत थी। उन्होंने भारतीय समकालीन कला को अंतरराष्ट्रीय मंच पर ख्याति दिलाने का जो काम किया है, उसे कला जगत में हमेशा याद किया जाएगा।

जब वे दिल्ली में रहते हुए कला की शिक्षा ले रहे थे तब उनके गुरु थे सोमनाथ होर और बीसी सान्याल, लेकिन उन्होंने अपनी पहचान बनाई अबानी सेन की छत्रछाया में। श्री सेन ने उनसे कहा था कि रोज पचास स्कैच बनाओ। मनजीत बावा रोज पचास स्कैच बनाते और उनके गुरु इनमें से अधिकांश को रद्द कर देते थे। यहीं से मनजीत बावा के रेखांकन का अभ्यास शुरू हुआ। उन्होंने अपने उन दिनों को याद करते हुए कहीं कहा भी था कि तब से मेरी लगातार काम करने की आदत पड़ गई। जब सब अमूर्त की ओर जा रहे थे मेरे गुरुओं ने मुझे आकृतिमूलकता का मर्म समझाया और उस ओर जाने के लिए प्रेरित किया। वे आकृतिमूलकता की ओर आए तो सही लेकिन अपनी नितांत कल्पनाशील मौलिकता से उन्होंने नए आकार खोजे, अपनी खास तरह की रंग योजना का आविष्कार किया और मिथकीय संसार में अपने विषय ढूँढ़े। यही कारण है कि उनके चित्र संसार में ठेठ भारतीयता के रंग व आकार देखे जा सकते हैं। वहाँ हीर-राँझा, कृष्ण, गोवर्धन, देवी तथा कई मिथकीय और पौराणिक प्रसंग-संदर्भ और हैं। इसके साथ ही उनके चित्रों में जितने जीव-जंतु हैं उतने शायद किसी अन्य भारतीय कलाकार में नहीं।

७० के दशक में स्व. जगदीश स्वामीनाथन के संपर्क में आकर मनजीत की कला में बड़ा फर्क आया था। भारतीय मिनिएचर कला से उन्हें बहुत कुछ सीखने का मौका मिला। पहाड़ी मिनिएचर और सिख मिनिएचर से उनका गहरा और सार्थक संवाद था। मनजीत चटक रंगों के विशेषज्ञ थे। लाल रंग खासतौर से उनकी कृतियों में सबसे ज्यादा बोलता है। सरल सूफियाना, काव्यात्मक छवियों को वह अद्भुत रूप दे देते थे। अपने स्टूडियो में मनजीत एक दिव्य आध्यात्मिक उपस्थिति थे।

भारत भवन भोपाल में रूपंकर कला निदेशक रहे मंजीत बावा को रूपंकर कलाओं में दिए गए योगदान के लिए कालिदास सम्मान प्रदान किया गया था।

तीन साल पहले ठंड के दिनों में ही चित्रकार मनजीत बावा को आखिरी बार देखा था। दिल्ली की बोधी आर्ट गैलरी में चित्रभानु मजूमदार की एकल प्रदर्शनी थी। वहां मनजीत बावा अपनी मित्र आर्ट क्यूरेटर इला पुरी के साथ पहुंचे तो परेशान नजर आ रहे थे। वह बोधी आर्ट गैलरी के मालिक अमित जज के कमरे में चले गए। फिर किसी ने बताया कि मनजीत की तबीयत बहुत खराब थी। वह चले गए हैं। गुड बाय का मौका ही नहीं मिला। इला पुरी को उन्हें अस्पताल ले जाना पड़ा।

स्ट्रोक के शिकार मनजीत कोमा में चले गए। तीन साल से वह कोमा में थे। किसी ने बताया कि मनजीत उस रात गैलरी अपनी नई महंगी गाड़ी में आए थे। पिछले दिनों एक फिल्म फेस्टिवल के सिलसिले में मैं हरियाणा के यमुनानगर में था। एक सुबह सपने में मनजीत से विचित्र-सी मुलाकात हुई। वह एक स्कूटर को चलाते हुए कहीं जा रहे हैं। मुझे भी पीछे बैठा लिया।

मैंने मनजीत से कहा, ‘आपकी 42 लाख की गाड़ी कहां है?’ पर वह स्कूटर में अपनी सूफी किस्म की मस्ती में चले जा रहे थे। सपना टूटने पर मैं सोचता रहा कि कहीं मनजीत हमारे बीच से चले तो नहीं गए। टेलिविजन खोलकर खबरें सुनीं। ऐसा कोई खराब समाचार नहीं था। लेकिन दो दिन बाद दिल्ली से युवा चित्रकार प्रतुल दाश का फोन आया, ‘आपको खबर मिली? मनजीत बावा का निधन हो गया है।’ मैं सोचता रहा अपने सपने के बारे में।

मनजीत बावा कोमा में जाने से पहले सुपरस्टार हो गए थे। उनके चित्र महंगे बिकने लगे थे। पेज थ्री कल्चर में भी वह हीरो हो चुके थे। विडंबना यह है कि जब मनजीत दुखद परिस्थितियों में कोमा में जा चुके थे, तो पेज थ्री कल्चर के संचालक नहीं जानते थे कि जिस मनजीत की ग्लैमरस पार्टी वाली इमिज हम छाप रहे हैं, वह अस्पताल में कोमा में पड़ा है। अखबारों से यह खबर छिपाई गई या उन्होंने इस बात पर ध्यान नहीं दिया।

मनजीत के मित्र चिंतित थे। कई महीने बीत गए। मनजीत की बेटी भावना कभी-कभी फैशन डिजाइनर रोहित गांधी की पैलेट आर्ट गैलरी में मिल
जाती थी। वह बड़ी हिम्मत से अपने फेमस फादर की बीमारी का सामना कर रही थी। उसकी मां शारदा का निधन 2001 में हो चुका था। उसका बड़ा भाई रवि हैंडिकैप्ड था। उदय प्रकाश ने अपने कहानी संग्रह ‘तिरिछ’ के कवर पर मनजीत बावा का जो प्रभावशाली रेखांकन छापा था, वह रवि का ही था।

रवि के हैंडिकैप होने की वजह से मनजीत की पत्नी शारदा दूसरे बच्चे के लिए तैयार नहीं थीं, इसीलिए भावना और रवि की उम्र में काफी अंतर है। जिन दिनों मनजीत की चित्रों से कोई खास कमाई नहीं थी, तब वह डलहौजी स्थित अपने एक होटल (मेहर) के सहारे काम चलाते थे। गर्मियों में वह वहीं रहकर पेंटिंग बनाया करते थे। रवि को साथ ले जाते थे। काफी समय उसके साथ बिताते थे।

1985 में मैं एक सप्ताह मनजीत के साथ डलहौजी के मेहर होटल में ठहरा था। मनजीत और रवि के संबंध बहुत अच्छे थे।

70 के दशक में स्व. जगदीश स्वामीनाथन के संपर्क में आकर मनजीत की कला में बड़ा फर्क आया था। भारतीय मिनिएचर कला से उन्हें बहुत कुछ सीखने का मौका मिला। पहाड़ी मिनिएचर और सिख मिनिएचर से उनका गहरा और सार्थक संवाद था। मनजीत ब्राइट कलर्स के मास्टर थे। लाल रंग खासतौर से उनकी कृतियों में सबसे ज्यादा बोलता है। सरल सूफियाना, काव्यात्मक छवियों को वह अद्भुत रूप दे देते थे। अपने स्टूडियो में मनजीत एक दिव्य आध्यात्मिक उपस्थिति थे।

एक बार वह मुझे देर तक ब्रश के बहुत साफ रहने की जरूरत बताते रहे। अक्सर चित्रकारों के यहां ब्रश, रंग आदि गंदी हालत में पडे़ रहते हैं। गोशाला में जन्मे मनजीत पशु-पक्षियों को अपने चित्रों में बहुत महत्व देते थे। पशुओं के उनके कुछ बडे़-बड़े रेखांकन अद्भुत हैं।

सूफी मस्ती मनजीत की खास पहचान थी। फिल्म बुद्धिजीवी मदनगोपाल सिंह के साथ उनका गाना-बजाना अनोखा होता था। वह कार को स्पीड में चलाने के शौकीन थे। एक सुबह उनके साथ जयपुर के आर्ट कैंप में जाना था। राजस्थान में उस दिन बंद था। सड़कें खाली थीं। मनजीत को तेज ड्राइविंग का मौका मिल गया। तीन घंटे में हम जयपुर में थे। वह खाना बनाने के भी शौकीन थे। इंडिया हैबिटेट सेंटर कई बार लोहड़ी के अवसर पर मनजीत-मदनगोपाल के गाने और खाने के प्रोग्राम कर चुका है।

शुरुआती संघर्ष के दिनों में मनजीत अपने खड़खड़िया स्कूटर से गढ़ी स्टूडियो आते-जाते थे। महिलाओं के साथ मनजीत की मित्रता हमेशा ‘ टॉक ऑफ द टाउन ‘ रहती थी। कोमा में जाने से पहले अंतिम आठ बरसों में इला पुरी उनकी ऑफिशल म्यूज (कला देवी) थीं। 1979 में एक पार्टी में मैंने मनजीत बावा से मजाक में कहा था, ‘जैसे छोटा पेग होता है, वैसे ही आप छोटे हुसैन हैं।’ बरसों बाद मनजीत जब आर्ट की दुनिया में सफल और मीडिया फेवरेट हो गए, तो वह मिलने पर अक्सर मेरे इस कॉमेंट की याद दिलाते थे।

आज में सोच रहा हूं कि मेरे सपने में मनजीत स्कूटर पर थे, मंहगी कार में नहीं। अपने खड़खड़िया स्कूटर और सूफी मस्ती में वह कहीं जा रहे थे।

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