हरचावरी चीमा |Harchavari Cheema mahan logo ki kahaniya in hindi| Hindi Kahaniya

जब लोग तरक्की की तलाश में अमेरिका, लंदन, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया जा रहे थे, तब अमृतसर के हरचावरी सिंह चीमा ने अफ्रीकी देश घाना का रुख किया और वहां खेती-किसानी के क्षेत्र में एक ऐसी मिसाल कायम कर दी कि घाना को तो उन पर नाज है ही, भारत भी कोई कम फख्र नहीं महसूस कर रहा।

सेलिब्रिटी के रूप में फिल्म स्टार, खिलाड़ी, नेता, उद्योगपति, सामाजिक कार्यकर्ता आदि को तो सभी जानते हैं, लेकिन कोई किसान किसी देश में सेलिब्रिटी बन जाए, तो यह वाकई अनोखी बात है और यह अनोखा काम हरचावरी सिंह चीमा ने कर दिखाया है। उन्होंने यह बात भी गलत साबित कर दी कि ग्लोबल इंडियन केवल आईटी, मैनेजमेंट या फाइनेंस के क्षेत्र में ही मशहूर हो सकते हैं। चीमा किसान परिवार के हैं और अब भी मूल रूप से किसान ही हैं। उन्होंने किसानी से ही दौलत कमाई और सम्मान हासिल किया और वह भी अफ्रीकी देश घाना में। वह 40 साल पहले अमृतसर से विस्थापित हुए थे। चीमा ने अपनी लगन, मेहनत और दृढ़ता से भारत का नाम रोशन किया है। आज वह घाना की जानी-मानी हस्तियों में से एक हैं। घाना के राष्ट्रपति उन्हें दो बार सर्वश्रेष्ठ किसान के रूप में सम्मानित कर चुके हैं। चीमा की गिनती सफलतम अनिवासी भारतीयों में होती है।

सारे मिथक तोड़ो

हरचावरी सिंह चीमा ने अपनी कामयाबी की दास्तान स्याही से नहीं, बल्कि पसीने से लिखी है। अमेरिका, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड आदि देशों में तो हर कोई जाना चाहता है, लेकिन चीमा पहुंच गए पश्चिमी अफ्रीकी देश घाना। तजुर्बे के नाम पर उनके पास सिर्फ मुंबई की कपड़ा मिल में मजदूरी का अनुभव था। उनका परिवार खेती-किसानी करता था। न कोई बड़ी पूंजी, न कोई रहनुमा और न आईआईएम या आईआईटी की डिग्री। पर वह कामयाबी की सभी सीढ़ियां अपनी मेहनत से चढ़ते चले गए, बिना किसी की मदद के, बिना पूर्व नियोजित लक्ष्य के। हर मोड़ पर उन्होंने अपनी नई मंजिल तय की और फिर वहां तक पहुंचे।

मूल धंधा मत छोड़ो

चीमा 40 साल पहले घाना गए तो थे एक सुपर मार्केट चेन में मैनेजर बनकर, लेकिन जब वहां मंदी का दौर आया, तो वह सुपर मार्केट बंद हो गया। उन्होंने घाना छोड़कर वापस भारत आने की बजाय वहीं रहने का फैसला किया और खुद का कारोबार शुरू करने का निश्चय किया। उन्होंने पॉल्ट्री फार्म खोला, लेकिन उसमें कोई खास कमाई नहीं हुई। अनेक किस्म की परेशानियों के कारण उन्हें मजबूरन वह व्यवसाय बंद करना पड़ा। फिर उन्हें लगा कि अगर कपड़ा बनाने का काम शुरू किया जाए, तो शायद कामयाबी मिले। उन्होंने एक छोटी-सी फैक्टरी खोली, लेकिन उसमें भी नाकामी हाथ लगी। हाल यह था कि उन्हें अपने परिवार के खाने के लिए मक्के की फसल खरीदनी पड़ती थी। अंतत: उन्हें लगा कि किसान परिवार का होने के नाते उन्हें खेती में ही हाथ आजमाना चाहिए और यही उनका भाग्य बना सकती है। लेकिन घाना की खेती बारिश पर निर्भर थी और किसानों को खाने के लाले पड़ रहे थे। फिर भी हिम्मत नहीं हारते हुए चीमा ने खेती में अनेक प्रयोग किए। उन्होंने यह महसूस किया कि अगर सब्जियों की खेती की जाए और उन्हें यूरोप निर्यात किया जाए, तो अच्छी आय हो सकती है। उन्होंने वही किया और कामयाब हुए।

हर काम में विशिष्टता

हरचावरी सिंह चीमा का काम करने का अंदाज अलग है। घाना में वैसे तो हजारों किसान हैं, जो रोजमर्रा के संघर्ष कर रहे हैं, लेकिन चीमा ने अलग राह पकड़ी। उन्होंने शोध किया कि वह घाना में कौन-कौन-सी फसलें उगा सकते हैं और क्या-क्या निर्यात कर सकते हैं। उन्होंने 25 तरह की सब्जियों के निर्यात की संभावनाएं तलाशीं, उनका उत्पादन और निर्यात शुरू किया। आज वह घाना से यूरोप के देशों को हजारों टन सब्जियां निर्यात कर रहे हैं, जिससे घाना को विदेशी मुद्रा मिल रही है और चीमा की भी अच्छी कमाई हो रही है। उन्होंने अनाज का भी उत्पादन शुरू किया और आधुनिक तकनीक अपनाकर अधिक से अधिक उत्पादन शुरू किया।

पूरी मजदूरी, पूरा टैक्स

मजदूरों को उनका पसीना सूखने से पहले पूरी मजदूरी मिल जानी चाहिए और सरकार को वक्त के पहले उसका टैक्स। अगर इस नीति पर अमल हो जाए, तो तनाव से बचा जा सकता है, और लोकप्रियता भी पाई जा सकती है। इस व्यवहार के कारण हरचावरी सिंह चीमा अपने मजदूरों में खूब पसंद किए जाते हैं। कभी भी मजदूरों की तरफ से चीमा की कोई शिकायत किसी को नहीं मिली। इसका एक और फायदा यह है कि उन्हें जब भी मजदूरों की जरूरत पड़ती है, मजदूर आसानी से उपलब्ध हो जाते हैं। खेती में मजदूरों की उपलब्धता बहुत मायने रखती है।

पूरी दुनिया अपना घर

घाना में जब चीमा की नौकरी चली गई थी, तब कई लोगों ने उन्हें सलाह दी कि अब उन्हें वापस भारत लौट जाना चाहिए। लेकिन उन्होंने इस सुझाव को नहीं माना। उन्होंने अपना घर बदला जरूर, लेकिन घाना में ही। घाना की राजधानी के घर से वह उपनगर में गए और फिर वहां से बाहरी इलाके में। उनका कहना है कि घाना के लोग बहुत अच्छे हैं, फिर वह घाना क्यों छोड़ें?
चीमा कहते हैं कि हो सकता है कि मैं कनाडा या अमेरिका में ज्यादा दौलत कमा लेता, लेकिन मेरे लिए पूरी दुनिया ही घर है। मैं यहां भी जितना धन कमा रहा हूं, मेरे और मेरे परिवार के लिए काफी है।

किसान से उद्यमी

हरचावरी सिंह चीमा आज घाना के नंबर वन किसान हैं, जो खाद्यान्न और सब्जियां उत्पादित करते हैं। उनका कहना है कि अब नंबर वन के आगे मैं इस क्षेत्र में कहां जा सकता हूं? बेहतर है कि मैं अपने काम को विस्तार दूं। हाल ही में उन्होंने पैकेजिंग इंडस्ट्री में कदम रखा है। उनकी परियोजनाओं को देखकर दुनिया भर के अनेक उद्यमी घाना में निवेश करने जा रहे हैं। चीमा किसानी से भी आगे बढ़कर कुछ करना चाहते हैं, घाना के लिए भी और अमृतसर के लिए भी।

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