अशोक चक्रधर |Ashok chakradhar mahan logo ki kahaniya in hindi| Hindi Kahaniya

डॉ. अशोक चक्रधर (जन्म 8 फऱवरी, सन 1951) हिन्दी के मंचीय कवियों में से एक हैं। उनकी लेखनी हास्य विधा के लिये जानी जाती है। कवि सम्मेलनों की वाचिक परंपरा को घर घर में पहुँचाने का श्रेय गोपालदास नीरज, शैल चतुर्वेदी, सुरेंद्र शर्मा और ओमप्रकाश आदित्य आदि के साथ-साथ इन्हें भी जाता है। उन्होने आसपास बिखरी विसंगतियों को उठाकर बोलचाल की भाषा में श्रोताओं के सम्मुख रखा।

वह क़हक़हे लगाते-लगाते अचानक गम्भीर हो जाते हैं और क़हक़हों में डूब जाते हैं, आँखें डबडबा आती हैं, इसमें हंसी के आँसू भी होते हैं, और उन क्षणों में, अपने आँसू भी, जब कवि उन्हें अचानक गम्भीरता में ऐसे डुबोता चला जाता है कि वे मन में उसकी कसक कहीं पर गहरे महसूस करने लगते हैं। उन्हें लगने लगता है कि यह दर्द भी उनका अपना ही है, उनके घर का है, उनके पड़ोसी का है।

जीवन परिचय

अशोक चक्रधर जी के पिताजी का नाम डॉ. राधेश्याम ‘प्रगल्भ’ और माताजी का नाम श्रीमती कुसुम ‘प्रगल्भ’ हैं। अशोक चक्रधर जी का जन्म 8 फऱवरी, सन 1951 में खु्र्जा (उत्तर प्रदेश) के अहीरपाड़ा मौहल्ले में हुआ। अशोक चक्रधर ने होश सम्भाला तो अपने चारों ओर विशुद्ध निम्नवर्गीय और मध्यमवर्गीय माहौल को महसूस किया। घर के ठीक सामने एक तेली का घर था, पर मज़े की बात यह है कि उसका दरवाज़ा इस गली में नहीं बल्कि तेलियों वाली गली में दूसरी ओर खुलता था। गली के एक छोर पर अहीर बसते थे, जिनका गाय-भैंस और घी-दूध का कारोबार था। तेल की धानी, भैंसों की सानी और गोबर की महक उस वातावरण की पहचान बन गई थी। नन्हें अशोक चक्रधर ने आदमियों और पशुओं को साथ-साथ रहते देखा, जीते देखा। एक-दूसरे के लिए दोनों की उपयोगिता को महसूस किया। कोल्हू के बैलों को आँखों पर बंधी पट्टियों से पीडि़त होते हुए। यही नहीं निम्नमध्यवर्गीय और निम्नवर्गीय परिवारों की त्रासदियों को भी महसूस किया। संयुक्त परिवार के संकटों को पहचाना।

पहली कविता

1956 या 1957 में जब अशोक पाँच-छह साल के थे, तो भूकम्प आया। मकान का वह हिस्सा गिर गया, जिसमें वह रहते थे। ताऊ जी द्वारा दूसरा हिस्सा भी रहने के लिए असुरक्षित घोषित कर दिया गया। नन्हें अशोक के पिता को सपरिवार पिछले हिस्से में शरण लेनी पड़ी। निहित स्वार्थों के ऊपर सहानुभूति की चादर ओढ़े हुए ताऊ जी तथा अन्य कुटुम्बजन तथाकथित सुरक्षा का हवाला देकर मकान को गिरवाने में जुट गए। संयुक्त परिवार में ऐसी घटनाओं के पीछे क्या मंतव्य होते हैं, यह किसी से भी छिपा नहीं रह सका है। इन्हीं प्रताडऩाओं के बीच नन्हें अशोक की पहली कविता ने जन्म लिया।

पहला कवि सम्मेलन

चीन के आक्रमण के तत्काल बाद, सन 1962 में ही, प्रगल्भ जी ने अपने कॉलेज में एक कविसम्मेलन आयोजित किया। सारे नामी-गिरामी कवि बुलाए गए। अशोक का नाम भी कवि सूची में शामिल कर लिया गया। उस दिन पिता ने पहली और अन्तिम बार बेटे की कविता पर रंदा चलाकर उसे चिकना-चुपड़ा बनाया था। रात को पं. सोहन लाल द्विवेदी की अध्यक्षता में कवि सम्मेलन आरम्भ हुआ। युद्धजन्य मानसिकता में माहौल गरम था। मंच पर वीररस की बरसात हो रही थी। नन्हें अशोक की कविता भी खूब जम गई। पं. सोहन लाल द्विवेदी ने सार्वजनिक रूप से लम्बा चौड़ा आशीर्वाद दिया और उस दिन से अशोक कहलाने लगे ‘बालकवि अशोक’। इस तरह कवि सम्मेलनों का सिलसिला बचपन में ही शुरू हो गया ।

जीवन में परिवर्तन

सन 1964 में जीवन ने तेज़ी से पहलू बदले। पिता ‘प्रगल्भ’ जी को श्री काका हाथरसी बेहद स्नेह करते थे। ‘प्रगल्भ’ जी काका जी की सलाह पर अपनी सत्रह साल पुरानी नौकरी छोड़कर सपरिवार हाथरस आ गए और ‘ब्रज कला केन्द्र’ की देख-रेख करने लगे। यह ‘ब्रज कला केन्द्र’ एक मिल मालिक सेठ जी अपनी सांस्कृतिक ललक में चलाया करते थे। हाथरस में एकदम वातावरण बदला। किशोर अशोक चक्रधर ने स्वयं को सुविधाओं के बीच एक सांस्कृतिक माहौल में पाया। अशोक वह सब कुछ अभी तक नहीं भूले है। कॉटन मिल की ऑफ़ीसर्स कॉलोनी के बड़े-बड़े कमरों का बाग़-बगीचों वाला घर, छोटे भाई-बहनों को गोदी में उठाकर खिलाना, मिल का रंगमंच, सुरुचि उद्यान का स्विमिंग पूल, रिहर्सल करते नौटंकी और रासलीला के कलाकार और दो ख़ास चीज़ें एक बोरोलिन और दूसरी नक़्क़ारा।

अभिनेत्री कृष्णा की नौटंकी

बौरोलिन नौटंकी की अभिनेत्री कृष्णा लगाया करती थी और नक्कारा बजाते थे अत्तन ख़ाँ। अशोक बहुत देर तक कृष्णा को मेकअप करते या गाने का रियाज़ करते देखा करते थे। कमरे में एकांत साधना कर रही हों या हॉल में सबके साथ रिहर्सल, अपनी सौन्दर्य सतर्कता में कृष्णा थोड़ी-थोड़ी देर के बाद बौरोलिन लगाती रहती थीं। सन 1965 से 1968 के बीच वह लाल कि़ला कवि सम्मेलन में भी प्रतितवर्ष बुलाए गए। यह सुखद स्थिति ज़्यादा नहीं टिकी, क्योंकि 1969 में सेठ जी ने मिल बंद कर दी और उसी के साथ-साथ उनका कला और संस्कृति प्रेम भी समाप्त हो गया यानी की कि ‘ब्रज कला केन्द्र’ का नौटंकी अध्याय लग
भग ठप्प हो गया।

आर्थिक संकट

लालाजी ने पूरे एक साल की तनख़्वाह नहीं दी और अशोक चक्रधर के पिता के सामने रोज़ी-रोटी की समस्या आ खड़ी हुई। पाँच बच्चे और पत्नी का साथ। सिफऱ् इतना ही नहीं, बड़े होते बच्चों की ज़रूरतें और मनोवैज्ञानिक समस्याएँ। किसी तरह से रोज़ी-रोटी के लिए अपनी सारी जमा-पूँजी लगाकर, घर के जेबर बेचकर, मथुरा में प्रिटिंग प्रैस लगाया गया।

मथुरा में प्रिटिंग प्रैस

प्रैस चल भी पड़ा, लेकिन मथुरा में जो घर मिला, वह ऐसी कॉलोनी में था, जहाँ पर पुराने रईस लोग रहा करते थे। पिता यहाँ धनाढ्य क्लब संस्कृति के शिकार हो गए। प्रैस की पूरी जि़म्मेदारी अशोक और छोटे भाई अनिल पर आ पड़ी। अशोक मालिक, मशीनमैन, कंपोज़ीटर और आर्डर लाने वाले एजैन्ट तक के रूप में प्रैस में जुटे रहे लेकिन धीरे-धीरे प्रैस ख़त्म होता गया। असल में प्रैस को एक ‘मल्टीपर्पज़’ अकेले युवक की क्षमताओं के अलावा कुछ अन्य क्षमताओं की भी ज़रूरत थी। व्यवसाय कर पाना, कवि-पिता के बस की बात नहीं रह गई थी।

पुरस्कार और सम्मान

(1) 1975 मुक्तिबोध की काव्यप्रक्रिया – वर्ष की सर्वश्रेष्ठ पुस्तक (किसी युवा लेखक द्वारा रचित), जोधपुर वि.वि., राजस्थान
(2) 1980 ‘ठिठोली पुरस्कार’, दिल्ली
(3) 1983 ‘हास्य-रत्न’ उपाधि ‘काका हाथरसी हास्य पुरस्कार’
(4) 1983 आकाशवाणी पुरस्कार ‘प्रौढ़ बच्चे’ सर्वश्रेष्ठ आकाशवाणी रूपक लेखन-निर्देशन पुरस्कार, दिल्ली
(5) 1985 ‘टी.ओ.वाई.पी. अवार्ड’, (टैन आउटस्टैंडिंग यंग परसन ऑफ इंडिया), जेसीज़ क्लब, बम्बई
(6) 1986 ‘समाज रत्न’ उपाधि साथी संगठन, दिल्ली
(7) 1988 ‘पं.जवाहर लाल नेहरू राष्ट्रीय एकता अवार्ड’, गीतांजलि, लखनऊ
(8) 1989 ‘मनहर पुरस्कार’, साहित्य कला मंच, बम्बई।
(9) 1991 धारावाहिक ‘ढाई आखर’ लेखन-निर्देशन के लिए भूतपूर्व राष्ट्रपति ज्ञानी ज़ैल सिंह द्वारा सम्मानित
(10) 1991 ‘बाल साहित्य पुरस्कार’, हिन्दी अकादमी, दिल्ली
(11) 1991 ‘पंगु गिरि लंघै’ सर्वश्रेष्ठ विकलांग आधारित फि़ल्म, लेखन-निर्देशन-निर्माण, राष्ट्रीय फि़ल्म महोत्सव, भारत सरकार

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